किन्नरों का दर्द

समाज में तरह-तरह से लोगों की भूमिका तय की जाती है, या दूसरे शब्दों में यूं कहें कि तय हो जाती है । इसमें सबसे बड़ा आधार बनता है लिंग यानि मर्द-औरत का विभाजन । लेकिन उनका क्या जो इस श्रेणी में आते ही नहीं । सच पूछिए तो समाज ने किन्नरों की भूमिका तय करने में कभी खास दिलचस्पी ली ही नहीं । इसलिए जीने-खाने के लिए उनसे जो बन पड़ा उन्होंने किया, हर किसी की खुशियों में शामिल होना...आशीष देना...उनकी सलामती की दुआ मांगना । और बदले में बख्शिश लेना । यहीं कुछ थोड़े से काम है जो किन्नरों के जिम्मे कर दी गई है । लेकिन बदलते समय में उनकी भूमिका भी बदलने लगी है । कभी तारणहार के किरदार में...तो कभी बेसहारा..मजलूमों के मसीहा के रोल में....लोगों के लिए खुशी का मौका हो या फिर गम का । किन्नरों ने सबके लिए समय निकाला...लेकिन उनके दुख-दर्द को जाना और समझा तो उनके ही अपने एक किन्नर ने...बाकी दुनिया ने उनकी तरफ देखना भी मुनासिब नहीं समझा । कह सकते हैं कि किन्नरों की कथा उनसे शुरू होती है, और उनपर ही खत्म होती है।
किन्नर...एक लफ्ज भर नहीं...किसी की पहचान है...शक्ल सूरत मर्दों की लेकिन व्यवहार से लेकर वेश तक जनाना...वो सजने-संवरने के शौकिन लोग जिनका पेशा है...नाचना-गाना...वहीं जो हमारी हर खुशी में झूमते-गाते शिरकत करते हैं...भले ही हम उन्हें अपनी जिंदगी में शामिल ना करें... उन्हें हिकारत भरी निगाहें से देखे...उनके लवों पर हमेशा हमारी सलामती की दुआएं रहती...क्योंकि जिन्हें अपनों ही ने ठुकरा दिया हो वो गैरों से क्या शिकवा करें...
शादी हो... बच्चे का जन्म या फिर खुशी का कोई और मौका...जनाना लिबास में मर्दाना आवाज के साथ ढोलक की थाप पर थिरकते...किन्नरों को कमवेश हर किसी ने देखा होगा.... खुशी के बोल...बधाईयां और दुआओं के बदले इनकी हथेली पर चन्द रुपये रख कर इन्हें विदा कर हम फिर से अपनी दुनिया में खो जाते हैं... लेकिन लिपे-पुते इन चेहरों की असलियत औऱ आंखों में छिपा दर्द जानने की फुरसत कितनों के पास है... गैरों की खुशियों में अपने हिस्से की मुस्कुराहट ढूंढने वाली इस जिंदगी में झाक कर देखें तो बेपनाह दर्द में लिपटा एक बेबस इंसान ही नजर आता है.... जिस्मानी कमी की कसक है...तो समाज ने भी कभी गले से नहीं लगाया... तो क्या हुआ...उन्होंने अपनी अलग दुनिया बसा कर ही गुजारा करना सीख लिया... नाचना,गाना और बख्शीश मांगना है...तो पेशा,पर करें तो क्या...शौक भी नहीं,बस दुनियां की भीड़ में खुद को तलाशने की एक कवायद भर...दुनियादारी भी पीछा नहीं छोड़ती...किन्नर होने की कसक फांस की तरह चुभती रहती है....
हम हकीकत से लाख मुंह चुरा लें...पर सच तो यहीं है एक मां की गोद में ही ऐसे बच्चें की पहली किलकारी गूंजती है...और फिर थोंथी व्यवस्था के चक्रव्यूह में फंसे समाज में अपनी लाज बचाने के लिए हम उस बच्चे को किन्नरों की गोद में सौंप देते हैं...जिसे एक क्षण के लिए हमने कलेजे का टुकड़ा कहा था...तब अपना फर्ज भी कोसों दूर छूट जाता है,औऱ हम भूल जाते हैं कि ये हमारा खून है...पल भर में हम अपनों को पराया कर देते हैं...जेनेटिक डिसऑर्डर की वजह से जिन्हें हम ठुकराते हैं...किन्नर समाज उन्हें अपना लेता है...अपने परिवार का सदस्य बनाता है...लालन-पालन से लेकर आजीविका कमाने की जिम्मेदारी उठाने के लायक बनाता है...इसी तरह एक-एक कर लोग जुटते जाते हैं और कारवां बनता जाता है...
किन्नर समाज में जब बच्चा जन्म लेता ही नहीं... तो आखिर इनकी संख्या कैसे बढ़ती हैं...दरअसल जेनेटिक डिसऑर्डर के कारण जब माता-पिता अपने ही खून से पीछा छुड़ाना चाहते हैं तो उस बेकसूर को किन्नर समाज अपना बनाता है... एक-एक सदस्य जुटते जाते हैं और परिवार बढ़ता जाता है...अपनों से बिछड़ने का दुख समाज से ठुकराए जाने का दर्द क्या होता है... ये भली भांति समझते हैं..ऐसे में दिल का दर्द किन्नर समाज में आने वाले हर नए सदस्य पर ममता बन कर बरसता है.... जैसे जैसे सदस्य बढ़ते जाते हैं उन्हें अनुशासन में रखने का जिम्मा भी बढ़ता है... सबको कायदे कानून में रखने के लिए किन्नरों को भी एक नेतृत्व की जरूरत होती है...और इसके लिए बकायदा एक मुखिया का चुनाव होता है... बस दो जून की रोटी की उम्मीद और किसी से कोई शिकायत नहीं... हाथ उठे तो सबकी सलामती की दुआ में.... नाचते गाते अपनी जिंदगी में रमे किन्नरों का ये कारवां चलता रहता है और समाज की कई धाराओं के बीच कुदरती विसंगती भी अपना रास्ता तलाश लेती है...
किन्नरों की अपनी दुनिया होती है... अपनों से ठुकराया... समाज ने दुत्कार दिया... तो क्या हुआ दुनियादारी तो छोड़ी नहीं जा सकती...मौजूदा समाज पारवारिक रिश्तों में गिरावट आई... लेकिन इसकी परछाई किन्नर समाज में दिखाई नहीं देती.. इनकी आपसी मेल मुहब्बत किसी मिसाल से कम नहीं....
शन्नो...कमला...छमछम...चमेली नाम कुछ भी हो सकता है...मजहब और जात पात भी अलग-अलग... फिर भी किन्नरों के आपसी रिश्ते में कभी खटास नहीं आती... घर से बाहर टोलियों में एक-दूसरे का साथ होता है.. तो घर के काम भी मिल जुल निपटाए जाते हैं... थोड़ी सी नोक झोंक और बइंतिहां मुहब्त.... पूजा पाठ औऱ रोज के काम निपटाने के बाद थोड़ी सी तफरी... थोड़ी मौज मस्ती... टीवी देखा कर मन बहता तो ठीक वर्ना नाचने गाने की पैटिक्स तो है ही.... हां कभी कभार घरवालों की याद आ जाती है तो मिल बैठकर एक दूसरे का दुख भी बांट लेते हैं...यहीं प्यार औऱ अपनापन है जो इस नए रिश्ते को ठुकराकर घर परिवार में लौटने का ख्याल भी नहीं आता...अपनों को इन्हें अपनाना होता तो खुद से जुदा ना किया होता... इतनी समझ तो हर किसी को है... तो क्या हुआ गर घरवालों ने नाता तोड़ लिया... अपने जैसे यहां कई हैं... प्यार औऱ खून के रिश्तों से भी बढ़कर...कम से कम यहां कोई जुदा करने की बात तो नहीं करता....
समाज से ठुकरा दिए गए किन्नरों ने शायद ये समझ लिया कि अपने जैसों का हाथ थाम कर ही वो इस दुनिया में जी सकते हैं... इसलिये एकसाथ रहकर उन्होने जीवन के संघर्ष से लोहा लेना तो सीखा.... लेकिन जीवन यापन की इसी जद्दोजहद ने किन्नरों के बीच वर्चस्व की लड़ाई को भी जन्म दिया... दरअसल किन्नरों के बीच लड़ाई की वजह किसी इलाके विशेष पर हक जमाने की मंशा से शुरू होती है.... इस संबंध में कई मामले थानों में भी रिपोर्ट किए जाते हैं...
वेशभूषा जनाना... फिर भी आम औरतों से अलग... शक्ल सूरत मर्दाना फिर भी पुरूष नहीं... किन्नर समाज का अंग होते हुए भी समाज में अस्तित्व की लड़ाई लड़ते रहे है.. पहचान से अलग इनकी दुनिया भी अगल है...और इस दुनिया में इनके जैसे ही लोगों का दाखिला है...भावनात्मक तौर सभी एक दूसरे से जुड़े...एक रोया तो दूसरे ने सहारा दिया... गले लगाया.... नाचना गाना आर्शीवाद और बधाईयां देना... और उससे जो कुछ मिला उसी में दिन गुजारा ... यानि रोजी रोटी का जरिया नाचना और गाना है.... लेकिन आजीविका का यहीं साधन किन्नरों के बीच लड़ाई का कारण भी बनता है... किन्नरों की मंडलियां.... एक-दूसरे के इलाके में नहीं पनप सकती...एकता की मिसाल पेश करने वाले ये किन्नर भी आखिर उसी समाज में रहते है जहां पल-पल आदमी में द्वेश पैता होता रहता है.... तो इसका असर भला किन्नरों पर कैसे नहीं पड़ेगा.... वर्चस्ववाद की ये लड़ाई... शुरू तो मामूली बकझक से होती है...लेकिन कभी कभी मामले इतने बढ़ जाते हैं कि बात पुलिस और थानों तक पहुंच जाती है.... किन्नरों को तो हमने आप से अलग कर दिया...लेकिन वो हमारी बुराईयों से दूर नहीं रह पाए..कितना अच्छा होता कि किन्नर हमारे समाज की बुराईयों से दूर रहते और हम उनकी एकता को आत्मसात कर पाते....
समाजिक मान्यता किन्नरों को शुभ मानती है...नववधू या नवजात बच्चे को किन्नरों से आर्शीवाद दिलाने की परंपरा रही है... लेकिन किन्नर अब केवल बधाईयां देने और गाने-बजाने वाले नहीं रहे.... इनकी भूमिका अब सामाजिक कार्यों में बढ़ गई है... उनकी उपयोगिता नगर निगम ने समझी है और शायद यहीं वजह है कि इनके व्यवहारों के हथियार टैक्स वसूलने में लगाया है...

जी हां समाज में उपेक्षित इन किन्नरों के इस जज्बे की ताफीफ करनी होगी जो हर मौके प तो हमें दुआओं से नवाजते ही है...लेकिन इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं……..

टिप्पणियाँ

रवि ठाकुर ने कहा…
ur article touches the heart. really its a fantastic work.
mukund jee, u hav thrown a light on the dark phases of society.
in society , we must respect everybody and treat them equally.

great work!!!!!!!!!
आप अपना प्यार इसी तरह से देते रहें... साथ ही अपनी राय भी...अपने ने समय निकाल कर मेरा ब्लॉग पढ़ा इसके लिए धन्यबाद...

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