पहचान की अति व्याकुलता

अपनी संस्कृति को लेकर सजग होना अच्छी बात है... लेकिन जब कोई इस पहचान को लेकर कट्टर , मुढ और गोलबंद होकर हिंसक हो जाए तो आप क्या कहेंगे । या यूं कहे कि जब ये पहचान राष्ट्र की पहचान पर हावी होने लगे तो परिणाम क्या होगा... निश्चित तौर पर पहचान की ये अति व्याकुलता अव्यवस्था को जन्म देगी... दुर्भाग्यवश देश सालों से ऐसी जातिगत,धर्मगत ,भाषागत और क्षेत्रगत पहचान बनाने को आतुर शक्तियों से जूझ रहा है । और इस धर्मगत,भाषागत और क्षेत्रगत पहचान बनाने को आतुर शक्तियों से जूझ रहा है । और इस दरम्यान राष्ट्रीय एकता- अखंडता औऱ सामाजिक समरसता बार-बार खंडित हुई है। संस्कृति का मतलब सामान्य तौर पर किसी निश्चित भू-भाग में फैले एक विशेष इंसानी समूह की जीवन जीने की शैली से लगाया जाता है । और जीवन की ये पद्धति मानव मस्तिष्क के सैंकड़ों हजारों सालों से क्रमिक और सतत विकास का परिणाम होती है । जब इंसान की मानसिक , सामाजिक और आर्थिक गतिविधियां समय के चक्र में सालों-साल तपती है तो एक व्यवस्था का जन्म होता है । और मनुष्य समाज की इन्हीं नियमों व्यवस्थाओं के बीच जीता है । संस्कृति के रूप में जीवन – यापन का ये स्तर अपने चरम पर होता है । लाजिमी है कि इंसान के जीवन में रच-बस गये इस रीति – रिवाजों में तनिक सा हेर-फेर भी तीव्र प्रतिक्रिया को आमंत्रित करता है । अपनी पहचान को लेकर सजग इन व्यक्तियों में समुदाय की भावना प्रबल होती है । और इस पहचान की रक्षा के लिए ये कभी कभी हिंसक भी बन जाते हैं।
हिन्दुस्तान के संदर्भ में समुदाय और संस्कृतियों का अध्ययन और भी महत्वपुर्ण है... क्योंकि हमारा देश विभिन्न सांस्कृतिक इकाइयों का मिश्रण है । पर गाये-बगाहे ये सांस्कृतिक इकाइयां आपस में टकराती रहती हैं। और अन्त में इसका खमियाजा देश को ही भुगतना पड़ता है। सामुदायिक इकाईय़ों के टकराव की वजह भी बड़ी व्यापक है । देश में घटित पिछले कुछ महीनों के घटनाक्रम पर नजर डालें तो पता चलेगा किये टकराव धार्मिक और क्षेत्रीय पहचना जैसे मुद्दों को लेकर हुए हैं... कुछ महीने पहले मुंबई में उत्तर भारतीयों के खिलाफ महाराष्ट्र की क्षेत्रीय पार्टियों का बवेला इस बात का उदाहरण है कि क्षेत्रीय अस्मिता की भावना अब तेजी से सर उठा रही है। दार्जिलिंग और सिलीगुड़ी में अलग राज्य को लेकर गोरखालैंड जन मुक्ति मोर्चा का हालिया प्रदर्शन इस बवेले की अगली कड़ी है। अपनी पहचान को नाजुक मसला मानने वाली इन इलाकों की जनता बड़ी आसानी से नेताओं की बातों में आ जाती है। और देश की संपत्ति इन इलाकों की जनता बड़ी आसानी से नेताओं की बातों में आ जाती है। और देश की संपत्ति और नागरिकों को ही नुकसान पहुंचाने से पीछे नहीं हटती । इस फसाद की शुरूआत करते हुए महाराष्ट्र की एक क्षेत्रीय पार्टी अक्सर कहती रहती है कि उत्तर भारतीय मराठी संस्कृति को नष्ट कर रहे हैं। जबकि इतिहास साक्षी है कि जो संस्कृति विश्व पटल पर भारतवर्ष का प्रतिनिधित्व करती है उसमें जितनी जीवंतता मराठी जीवन शैली की है। उत्तर ,दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत की जीवन शैली भी उसमें उतनी ही झलकती है । हमें समझना होगा कि संस्कृति की चिंता करने वाली पार्टियां लोक-जीवन में फैले भष्ट्राचार और बेइमानी की संस्कृति पर शायद ही सजगता दिखाए ।

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