किन्नरों का दर्द
समाज में तरह-तरह से लोगों की भूमिका तय की जाती है, या दूसरे शब्दों में यूं कहें कि तय हो जाती है । इसमें सबसे बड़ा आधार बनता है लिंग यानि मर्द-औरत का विभाजन । लेकिन उनका क्या जो इस श्रेणी में आते ही नहीं । सच पूछिए तो समाज ने किन्नरों की भूमिका तय करने में कभी खास दिलचस्पी ली ही नहीं । इसलिए जीने-खाने के लिए उनसे जो बन पड़ा उन्होंने किया, हर किसी की खुशियों में शामिल होना...आशीष देना...उनकी सलामती की दुआ मांगना । और बदले में बख्शिश लेना । यहीं कुछ थोड़े से काम है जो किन्नरों के जिम्मे कर दी गई है । लेकिन बदलते समय में उनकी भूमिका भी बदलने लगी है । कभी तारणहार के किरदार में...तो कभी बेसहारा..मजलूमों के मसीहा के रोल में....लोगों के लिए खुशी का मौका हो या फिर गम का । किन्नरों ने सबके लिए समय निकाला...लेकिन उनके दुख-दर्द को जाना और समझा तो उनके ही अपने एक किन्नर ने...बाकी दुनिया ने उनकी तरफ देखना भी मुनासिब नहीं समझा । कह सकते हैं कि किन्नरों की कथा उनसे शुरू होती है, और उनपर ही खत्म होती है। किन्नर...एक लफ्ज भर नहीं...किसी की पहचान है...शक्ल सूरत मर्दों की लेकिन व्यवहार से लेकर ...