छोटे अखबारों की भूमिका
इलेक्ट्रानिक मीडिया के जमाने में भी जनसंचार के रुप में अखबारों की भूमिका निर्विवाद रुप से स्थापित है। अखबारों ने न सिर्फ देश के सुदूर इलाकों में अपनी पहुंच बनाई है, बल्कि इन इलाकों में ये विकास की प्रक्रिया में उत्प्रेरक भी सिद्ध हुए हैं। पर जब बात इन अखबारों के सामाजिक सरोकार की आती है, तो बाजार का दबाव इलेक्ट्रोनिक मीडिया की ही तरह यहां भी साफ दिखता है। जाहिर है फिल्म,क्रिकेट,सेर्लिब्रेटी और सेक्स की खबरें हावी हो जाता है। टीवी न्यूज़ के प्राइम टाइम और बड़े अखबारों के मुख्यपृष्टों में इन्हें ज़्यादा तरजीह मिल जाती है , तो अब किसी को हैरानी नहीं होती । रानी मुखर्जी के शिड्डी में जमीन खरीद में हुई ठगी को सभी सुर्खी बना लेते हैं। युवराज सिंह के छे गेंदों पर छे छक्कों से मीडिया ऐसा माहौल बना देता है कि मानो देश की सभी समस्याएं ही खत्म हो गई । लेकिन कर्ज के बोझ तले विदर्भ , आंध्रप्रदेश में किसानों की खुदकुशी , महिलाओं , बच्चों के खिलाफ होने वाले अत्याचार , सरकार और समाज में लोगों की हिस्सेदारी और अधिकार जैसे विषयों को कभी उतना स्पेस और वक्त नहीं दिया जाता है। जाहिर है जो खबरें बिकेगी... वही दिखेगी... वही छपेगी । क्योंकि यहीं बाजारवाद है। आपने सुबह-सुबह चाय की टेबल पर कभी देश के चुनिंदा अखबारों पर नजर डाला है। इनके स्पलीमेंट इश्यु , पेज थ्री पर छपने वाले चमकते चेहरे.... एकबारगी ये अखबार आपको समाचार पत्र कम... कागजों के रंगीन गुच्छे ज़्यादा मालूम पडेंगे । लेकिन इन बड़े अखबारों के समांतर कुछ मझोले और छोटे समाचार पत्र भी देश में छपते हैं। और बाजार के तमाम दबावों के बावजूद ये अपना वजूद कायम किये हुए हैं। इस सफलता की वजह साफ है, रोजाना छपने वाली बड़ी अखबारें जहां ग्लैमर औऱ बाजार के मकड़जाल में फंसकर आम जन की चिंता और सरोकार से दूर होती जा रही है। वहीं छोटे अखबारों ने अपने सीमित संसाधनों के बावजूद ज़मीन से जुड़े मुद्दों को बड़े जोर-शोर से उठाया है। प्रतियोगिता के इस दौर में आगे भागने की होड़ मची हुई है, लेकिन इन सबके बीच पीछे छूट जाती है वो खबरें । जो आपके सरोकार की होती है , इन सबके बावजूद इन अखबारों को अबतक समाजिक पहचान नहीं मिल पाई है । सवाल उठता है कि बाज़ारवाद के इस दौर में ये छोटे अखबार कब तक अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते रहेंगे। ये तभी संभव है जब आम जन का झुकाव इन छोटे अखबारों की तरफ होगा।
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