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खूनी हिंसा

सालों से झारखंड में खूनी हिंसा का दौर जारी है... आज नक्सली हिंसा से झारखंड लहूलुहान है... सरकार का सुरक्षा तंत्र बेबस नजर आ रहा है... राजनेता में समस्या को सुलझाने का ना कौशल नजर आ रहा है ना ही वो नज़रिया जो नक्सलवाद को समाज और व्यवस्था के दायरे में समा सके... और इस सबसे बीच आरोपों से घिरा नक्सलवाद भी खुद अंधेरे में भटकता नज़र आ रहा है । रमेश मुंडा... डीएसपी प्रमोद कुमार... लैंड माइंस ब्लास्ट में शहीद...इससे पहले दिन दहारे पांच करोड़ की लूट... ये कुछ सुर्खियां हैं जो बुंडू से निकली हैं... इसके मायने क्या हैं झारखंड में सभी जानते हैं... लेकिन कुछ साल पहले तक अमन-चैन की बगिया रही बुंडू की धरती आज पूछ रही है... आखिर क्यों जल रहा है झारखंड... कुल जमा आठ साल का ये राज्य अभी गिर-गिर कर चलना सीख रहा है... क्या खून से लथपथ लाशों का बोझ ढोने के लिए बना था ये प्रदेश... व्यवस्था नाकाम है...तंत्र पंगु हो चुका है... जो व्यवस्था का हिस्सा हैं... स्वार्थ सिद्धि में लगे हैं... घुन लग चुकी ये व्यवस्था अपना मकसद भूल चुकी है... खोखले हो चुके इस तंत्र में आज भी कुछ बाकी है तो वो है बेबसी और बेशर्मी... जो ...

खूनी हिंसा

सालों से झारखंड में खूनी हिंसा का दौर जारी है... आज नक्सली हिंसा से झारखंड लहूलुहान है... सरकार का सुरक्षा तंत्र बेबस नजर आ रहा है... राजनेता में समस्या को सुलझाने का ना कौशल नजर आ रहा है ना ही वो नज़रिया जो नक्सलवाद को समाज और व्यवस्था के दायरे में समा सके... और इस सबसे बीच आरोपों से घिरा नक्सलवाद भी खुद अंधेरे में भटकता नज़र आ रहा है । रमेश मुंडा... डीएसपी प्रमोद कुमार... लैंड माइंस ब्लास्ट में शहीद...इससे पहले दिन दहारे पांच करोड़ की लूट... ये कुछ सुर्खियां हैं जो बुंडू से निकली हैं... इसके मायने क्या हैं झारखंड में सभी जानते हैं... लेकिन कुछ साल पहले तक अमन-चैन की बगिया रही बुंडू की धरती आज पूछ रही है... आखिर क्यों जल रहा है झारखंड... कुल जमा आठ साल का ये राज्य अभी गिर-गिर कर चलना सीख रहा है... क्या खून से लथपथ लाशों का बोझ ढोने के लिए बना था ये प्रदेश... व्यवस्था नाकाम है...तंत्र पंगु हो चुका है... जो व्यवस्था का हिस्सा हैं... स्वार्थ सिद्धि में लगे हैं... घुन लग चुकी ये व्यवस्था अपना मकसद भूल चुकी है... खोखले हो चुके इस तंत्र में आज भी कुछ बाकी है तो वो है बेबसी और बेशर्मी... जो ...

पहचान की अति व्याकुलता

अपनी संस्कृति को लेकर सजग होना अच्छी बात है... लेकिन जब कोई इस पहचान को लेकर कट्टर , मुढ और गोलबंद होकर हिंसक हो जाए तो आप क्या कहेंगे । या यूं कहे कि जब ये पहचान राष्ट्र की पहचान पर हावी होने लगे तो परिणाम क्या होगा... निश्चित तौर पर पहचान की ये अति व्याकुलता अव्यवस्था को जन्म देगी... दुर्भाग्यवश देश सालों से ऐसी जातिगत,धर्मगत ,भाषागत और क्षेत्रगत पहचान बनाने को आतुर शक्तियों से जूझ रहा है । और इस धर्मगत,भाषागत और क्षेत्रगत पहचान बनाने को आतुर शक्तियों से जूझ रहा है । और इस दरम्यान राष्ट्रीय एकता- अखंडता औऱ सामाजिक समरसता बार-बार खंडित हुई है। संस्कृति का मतलब सामान्य तौर पर किसी निश्चित भू-भाग में फैले एक विशेष इंसानी समूह की जीवन जीने की शैली से लगाया जाता है । और जीवन की ये पद्धति मानव मस्तिष्क के सैंकड़ों हजारों सालों से क्रमिक और सतत विकास का परिणाम होती है । जब इंसान की मानसिक , सामाजिक और आर्थिक गतिविधियां समय के चक्र में सालों-साल तपती है तो एक व्यवस्था का जन्म होता है । और मनुष्य समाज की इन्हीं नियमों व्यवस्थाओं के बीच जीता है । संस्कृति के रूप में जीवन – यापन का ये स्तर अपने...

किन्नरों का दर्द

समाज में तरह-तरह से लोगों की भूमिका तय की जाती है, या दूसरे शब्दों में यूं कहें कि तय हो जाती है । इसमें सबसे बड़ा आधार बनता है लिंग यानि मर्द-औरत का विभाजन । लेकिन उनका क्या जो इस श्रेणी में आते ही नहीं । सच पूछिए तो समाज ने किन्नरों की भूमिका तय करने में कभी खास दिलचस्पी ली ही नहीं । इसलिए जीने-खाने के लिए उनसे जो बन पड़ा उन्होंने किया, हर किसी की खुशियों में शामिल होना...आशीष देना...उनकी सलामती की दुआ मांगना । और बदले में बख्शिश लेना । यहीं कुछ थोड़े से काम है जो किन्नरों के जिम्मे कर दी गई है । लेकिन बदलते समय में उनकी भूमिका भी बदलने लगी है । कभी तारणहार के किरदार में...तो कभी बेसहारा..मजलूमों के मसीहा के रोल में....लोगों के लिए खुशी का मौका हो या फिर गम का । किन्नरों ने सबके लिए समय निकाला...लेकिन उनके दुख-दर्द को जाना और समझा तो उनके ही अपने एक किन्नर ने...बाकी दुनिया ने उनकी तरफ देखना भी मुनासिब नहीं समझा । कह सकते हैं कि किन्नरों की कथा उनसे शुरू होती है, और उनपर ही खत्म होती है। किन्नर...एक लफ्ज भर नहीं...किसी की पहचान है...शक्ल सूरत मर्दों की लेकिन व्यवहार से लेकर ...

छोटे अखबारों की भूमिका

इलेक्ट्रानिक मीडिया के जमाने में भी जनसंचार के रुप में अखबारों की भूमिका निर्विवाद रुप से स्थापित है। अखबारों ने न सिर्फ देश के सुदूर इलाकों में अपनी पहुंच बनाई है, बल्कि इन इलाकों में ये विकास की प्रक्रिया में उत्प्रेरक भी सिद्ध हुए हैं। पर जब बात इन अखबारों के सामाजिक सरोकार की आती है, तो बाजार का दबाव इलेक्ट्रोनिक मीडिया की ही तरह यहां भी साफ दिखता है। जाहिर है फिल्म,क्रिकेट,सेर्लिब्रेटी और सेक्स की खबरें हावी हो जाता है। टीवी न्यूज़ के प्राइम टाइम और बड़े अखबारों के मुख्यपृष्टों में इन्हें ज़्यादा तरजीह मिल जाती है , तो अब किसी को हैरानी नहीं होती । रानी मुखर्जी के शिड्डी में जमीन खरीद में हुई ठगी को सभी सुर्खी बना लेते हैं। युवराज सिंह के छे गेंदों पर छे छक्कों से मीडिया ऐसा माहौल बना देता है कि मानो देश की सभी समस्याएं ही खत्म हो गई । लेकिन कर्ज के बोझ तले विदर्भ , आंध्रप्रदेश में किसानों की खुदकुशी , महिलाओं , बच्चों के खिलाफ होने वाले अत्याचार , सरकार और समाज में लोगों की हिस्सेदारी और अधिकार जैसे विषयों को कभी उतना स्पेस और वक्त नहीं दिया जाता है। जाहिर है जो खबरें बिकेगी... व...